
जनपद प्रतापगढ़ विकासखंड मांधाता में बारिश नहीं, बदहाल जलनिकासी बन रही मुसीबत
तालाबों का घटता अस्तित्व और सरकारी नालों पर अतिक्रमण से गांवों में जलभराव का संकट—कागजों में विकास, जमीन पर पानी-पानी
प्रतापगढ़। बरसात होते ही विकासखंड मांधाता की ग्राम पंचायतों में जलभराव की समस्या कोई नई तस्वीर नहीं है। हर साल बारिश आती है, पानी भरता है, ग्रामीण परेशान होते हैं और कुछ दिनों बाद पानी उतरते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ बारिश की मात्रा का नहीं, बल्कि गांवों की बिगड़ी हुई जलनिकासी व्यवस्था और प्रशासनिक अनदेखी का है।
मांधाता क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में कभी बारिश के पानी को अपने भीतर समेटने वाले तालाब गांवों की प्राकृतिक व्यवस्था का अहम हिस्सा हुआ करते थे। आज कई जगह तालाबों का क्षेत्रफल घटने, उनके आसपास अतिक्रमण होने, मिट्टी डालकर समतलीकरण किए जाने या तालाबों के उपयोग में बदलाव की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसका सीधा असर बारिश के दौरान दिखाई देता है—पानी के पास जाने के लिए तालाब नहीं और गांव से बाहर निकलने के लिए नाला नहीं।
तालाब खत्म हुए तो पानी ने रास्ता बदल दिया
ग्रामीण इलाकों में तालाब केवल पानी जमा करने की जगह नहीं, बल्कि प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र का हिस्सा होते हैं। जब तालाब सिकुड़ते हैं या उनका रास्ता बाधित होता है तो बारिश का पानी आबादी और खेतों में फैलने लगता है।
मांधाता क्षेत्र में तालाबों और जलनिकासी को लेकर उठते सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि जिले में सरकारी जमीन और तालाब की भूमि पर कब्जे तथा नाला बंद होने से जलभराव की समस्या का मामला पहले भी सामने आ चुका है।
*सरकारी नाले-नालियां भी अतिक्रमण की जद में?*
जलभराव की दूसरी बड़ी वजह गांवों के सरकारी नाले और नालियों पर कथित अतिक्रमण है। कई स्थानों पर नालियों के ऊपर निर्माण, रास्ते में मिट्टी-ईंट डालना, निकासी के मुहाने को बंद करना अथवा नाली को संकरा कर देना बारिश के पानी के लिए बड़ी बाधा बन जाता है।
नतीजा यह होता है कि जिस पानी को नाले के रास्ते गांव से बाहर निकल जाना चाहिए, वही पानी घरों, गलियों, स्कूलों और सार्वजनिक रास्तों के आसपास जमा होने लगता है।
सवाल यह है कि ग्राम पंचायतों और राजस्व विभाग के अभिलेखों में दर्ज सार्वजनिक जलनिकासी मार्ग जमीन पर कितने सुरक्षित हैं?
नाली बनी भी तो निकासी कहां?
कई जगह समस्या सिर्फ नाली न बनने की नहीं है। सवाल यह भी है कि नाली बनने के बाद उसका अंतिम निकास कहां है?
यदि नाली का पानी किसी तालाब, बड़े नाले या प्राकृतिक जलनिकासी मार्ग तक नहीं पहुंचता तो नई नाली भी बारिश के समय खुद जलभराव का कारण बन सकती है। इसलिए केवल नाली निर्माण के नाम पर समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं।
कागजों में सफाई, जमीन पर चोक नालियां!
*ग्राम पंचायतों में सफाई व्यवस्था और कूड़ा प्रबंधन पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं* मांधाता क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में अपशिष्ट प्रबंधन केंद्रों के उपयोग और सफाई व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बरसात से पहले नालियों की वास्तविक सफाई कितनी हुई? कितनी नालियां खुलीं? कितने जलनिकासी मार्गों से अतिक्रमण हटाया गया? और कितने तालाबों की स्थिति का मौके पर सत्यापन हुआ?
इन सवालों का जवाब सिर्फ कागजी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि गांवों में मौके पर जाकर मिलना चाहिए।
*जिम्मेदारी तय हो तो तस्वीर बदल सकती है*
जरूरत है कि विकासखंड मांधाता की सभी ग्राम पंचायतों में विशेष अभियान चलाकर—
👉राजस्व अभिलेखों में दर्ज तालाबों का सीमांकन कराया जाए।
👉तालाब की भूमि पर हुए अतिक्रमण की जांच कर कार्रवाई की जाए।
👉सरकारी नालों और नालियों की पैमाइश कराकर कब्जे हटाए जाएं।
👉बरसात से पहले सभी प्रमुख नालियों की सफाई की वास्तविक जांच हो।
👉बंद पड़े प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों को चिह्नित कर पुनः खोला जाए।
👉प्रत्येक ग्राम पंचायत में जलनिकासी का स्थायी नक्शा तैयार किया जाए।
👉जलभराव वाले स्थानों की सूची बनाकर जिम्मेदार विभाग को समाधान की समयसीमा दी जाए।
*सबसे बड़ा सवाल—बारिश दोषी या व्यवस्था?*
हर बार बारिश को जिम्मेदार ठहराकर प्रशासनिक व्यवस्था को सवालों से बचाया नहीं जा सकता। अगर तालाब सुरक्षित हों, नाले खुले हों और जलनिकासी के रास्ते अतिक्रमण मुक्त हों तो बारिश का पानी गांवों के लिए आफत बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है।
मांधाता की ग्राम पंचायतों में अब जरूरत राहत के नाम पर अस्थायी इंतजाम की नहीं, बल्कि जलनिकासी व्यवस्था की स्थायी पड़ताल की है।
क्योंकि सवाल साफ है—
जब गांव के तालाब सिकुड़ते जाएंगे और सरकारी नालों पर कब्जे होते रहेंगे, तो बारिश का पानी आखिर जाएगा कहां?
ग्रमीण क्षेत्र वासियों का मानना है कि अब प्रशासन को सिर्फ जलभराव देखने नहीं, उसके कारणों की जांच करने की जरूरत है। ऐसी दशा में जल निकासी की समस्या से जूझ रहे गांव का भौतिक सत्यापन करते हुए उपरोक्त बिंदुओं पर विचार विमर्श किया जाना चाहिए जिससे उपरोक्त समस्या से जनता को राहत मिल सके।