भारत में मीडिया स्वतंत्र तो है लेकिन गुलाम बनकर रहता है

*भारत में मीडिया स्वतंत्र तो है लेकिन गुलाम बनकर रहता है*

 

*बात तो कड़वी है पर सच्चाई लिखी है बिलाल की कलम कभी बिकती नही*

भारत में पत्रकारिता संकट के दौर से गुजर रही है। सच की आवाज को बुलंद करने वाले पत्रकारों पर दिनोंदिन हमले तेज होते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पेपर की खबर छापने पर पत्रकारों को ही जेल में डाल दिया गया सच्चाई अगर पत्रकार लिखता है उसको सलाखों के पीछे भेज दीया जाता है या गोली मारकर हमलावर हत्या तक कर देते हैं

देश में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति बढ़ती क्रूरता का अंदाजा तो इससे ही लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष में कई और पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी स्कूलों की मिड डे मील की खबर छापने का पर जेल जाना पड़ा

पेपर लीक की खबर अखबार में प्रकाशित करने पर भी जेल जाना पड़ा मध्यप्रदेश में पत्रकारों के कपड़े तक उतरवा दिए गए आजादी के इस दौर में हम गुलाम बनकर अपनी कलम को आखिर कब तक चल आएगा पत्रकार का काम सत्ता से सवाल करना होता है लेकिन हमारे देश की चाटुकार पत्रकारिता बनकर रह गई है सत्ता से सवाल करने की किसी की हिम्मत नहीं इस देश को दूसरी दिशा में ले जाने के लिए सरकार के साथ पत्रकारिता का सबसे बड़ा अहम रोल है जानकारी के अनुसार

निःसंदेह, मीडिया सूचना स्त्रोत के रुप में खबरें पहुंचाने का काम करता है, तो वहीं हमारा मनोरंजन भी करता है। मीडिया जहां संचार का साधन है, तो वहीं परिवर्तन का वाहक भी है। इसी वजह से एडविन वर्क द्वारा मीडिया को ‘लोकतंत्र का चौथा’ स्तंभ कहा गया था। भारत में मीडिया को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता है। यानी की प्रेस की आजादी मौलिक अधिकार के अंतर्गत आती है। लेकिन, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में निरंतर हो रही पत्रकारों की हत्या, मीडिया चैनलों के प्रसारण पर लगायी जा रही बंदिशें व कलमकारों के मुंह पर आए दिन स्याही पोतने जैसी घटनाओं ने प्रेस की आजादी को संकट के घेरे में ला दिया है। आज ऐसा कोई सच्चा पत्रकार नहीं होगा, जिसे रोज-ब-रोज मारने व डराने की धमकी नहीं मिलती होगी।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट यानी आई.एफ.जे. के सर्व के अनुसार, वर्ष 2016 में पूरी दुनिया में 122 पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे गये। जिसमें भारत में भी छह पत्रकारों की हत्या हुई। वहीं पिछले एक दशक के अंतराल में 2017 को पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में सबसे खराब माना गया है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की मानें तो दुनिया भर में पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। प्रेस की आजादी पर संस्था ने जो अंतरराष्ट्रीय सूची जारी की है उसमें भारत 136वें स्थान पर है। पत्रकारों की सुरक्षा पर निगरानी रखने वाली प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कमेटी टू प्रोटेक्स जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) की मानें तो भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की जान को खतरा है। 2015 में जारी इस संस्था की एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में रिपोर्टरों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा अभी भी नहीं मिल पा रही है। इसी कारण उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ के एक अध्ययन में भी यह बात प्रकाश में आयी थी कि पत्रकारों की हत्याओं के पीछे जो तत्त्व होते हैं, वे पत्रकारिता के बारे में आज आमजन की राय क्या है? क्या भारत में पत्रकारिता एक नया मोड़ ले रही है? क्या सरकार प्रेस की आजादी पर पहरा लगाने का प्रयास कर रही है? क्या बेखौफ होकर सच की आवाज को उठाना लोकतंत्र में “आ बैल मुझे मार” अर्थात् खुद की मौत को सामने से आमंत्रित करना है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो आज हर किसी के जेहन में उठ रहे हैं। माना जाता है कि हाल के दिनों में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले लोगों पर हमले तेज हुए हैं। इसके सबसे ज्यादा शिकार ईमानदार पत्रकार व सच्चे समाजसेवी रहे हैं। उन्मत्त भीड़ द्वारा किये गये हमलों में कई बार सरकार की भी शह होती है। यूं तो सत्ता और मीडिया में छत्तीस का आंकड़ा रहा है। लेकिन, कई बार शक्तिशाली सत्तायें मीडिया के दमन से भी परहेज नहीं करती हैं।

दूसरी बात यह कि कई बार मीडिया भी अपने मूल चरित्र से इत्तर कुछ लाभ के लिए सत्ता और बाजार के हाथों की कठपुतली बन जाता है।

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