यूक्रेन में फंसे 60 लाख बच्चों का भविष्य और जीवन दांव पर

युद्धग्रस्त यूक्रेन में फंसे 60 लाख बच्चों का भविष्य और जीवन दांव पर है। सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेन में अब तक 464 से अधिक स्कूल तबाह हो चुके हैं। वहीं बच्चों के 43 अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई है।रिपोर्ट की मानें तो रूसी बमबारी के बीच हर पांच में से एक बच्चा परिवार संग अपना घर छोड़ने को मजबूर है।

 

यूक्रेन करीब 75 लाख बच्चों का घर था, लेकिन युद्ध के बीच 15 लाख से अधिक बच्चे अपना घर छोड़ चुके हैं यानी बेघर हो गए हैं। यूक्रेन में सेव द चिल्ड्रेन के निदेशक पेट वॉल्श का कहना है कि बच्चों के जीवन पर खतरा इसलिए मंडरा रहा है क्योंकि रूसी सेना ऐसे स्थानों पर हमले कर रही है, जहां बड़ी संख्या में बच्चे छिपे हैं।

 

वहीं, स्कूलों में भी बड़ी संख्या में बच्चे पनाह लिए हुए हैं जहां रूस लगातार बम बरसा रहा है। इसी का नतीजा है कि 460 से अधिक स्कूल बमबारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। वहीं 60 से अधिक स्कूल पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। अस्पतालों पर लगातार हो रहे हमलों के कारण बीमार बच्चों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है क्योंकि लंबे समय से उनका इलाज प्रभावित हो रहा है।

 

रूसी हमले में 100 से अधिक बच्चों की मौत

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार रूसी सेना की कार्रवाई में अबतक 59 बच्चों की मौत की बात सामने आई है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हमले में मारे गए बच्चों की संख्या 100 से अधिक हो गई है। कीव, खारकीव और मारियुपोल में रूस द्वारा अब तक किए गए मिसाइल हमले में स्थानीय लोगों के साथ बड़े पैमाने पर बच्चों की मौत हुई है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार अस्पतालों में बमबारी के बीच कई नवजात बच्चों की भी मौत हुई है।

 

और कितने बच्चों की जाएगी जान?

वॉल्श ने पूछा कि यूक्रेन में और कितने बच्चों की जानें जाएंगी, जिनकी कोई गलती नहीं है। उन्होंने कहा है कि रूसी हमले से बच्चों के जीवन को तो खतरा है ही। युद्ध के कारण जिस तरह के हालात बने हैं उस कारण बच्चों को पौष्टिक आहार तक नहीं मिल रहा है। मानसिक दबाव अलग है। इसका सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। इस कारण युद्धक्षेत्र में फंसे दस में से सात बच्चों का जीवन संकट में पड़ सकता है।

 

80 हजार बच्चों का जन्म होगा

सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेन के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में अगले तीन माह में 80 हजार बच्चों का जन्म होना है। ऐसे में कठिन हालात के बीच जच्चा-बच्चा को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराना भी चुनौती बनी हुई है। यूनिसेफ पहले ही कह चुका है कि यूक्रेन के 50 फीसदी से अधिक अस्पतालों में जरूरी दवा और अन्य संसाधनों का संकट हो गया है। ऐसे हालात के बीच गंभीर बच्चों और प्रसूता को उपचार मुहैया कराना आने वाले दिनों में मुश्किल होगा।

 

बच्चे के जीवन और स्वास्थ्य पर असर

नॉर्वे के पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में 160 करोड़ बच्चे युद्धग्रस्त देशों में रह रहे थे। वहीं 42.6 करोड़, हर छह में से एक बच्चा जहां युद्ध चल रहा है उसके 50 किलोमीटर के दायरे में रहता था। रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के लिए युद्धग्रस्त सीरिया, अफगानिस्तान और सोमालिया सबसे खतरनाक देश हैं जहां बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य दोनों को भारी नुकसान हुआ है। युद्ध के कारण यहां बच्चे दूसरों की मदद पर निर्भर हैं।

 

इन देशों में युद्ध के शिकार हुए बच्चे

सीरिया: यूनिसेफ के अनुसार युद्ध के हालात के बीच दस लाख से अधिक बच्चों का जन्म हुआ। हर दस घंटे में यहां युद्ध के दौरान एक बच्चे की मौत हुई। कुल 5427 बच्चों की मौत।

 

अफगानिस्तान: युद्ध के कारण यहां 2018 तक पांच हजार से अधिक बच्चों की जान गई। वहीं लाखों की संख्या में बच्चों की पढ़ाई छूट गई। युद्ध में सबसे ज्यादा बच्चे मारे गए थे।

 

यमन: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यहां युद्ध शुरू होने के बाद 1427 बच्चों की मौत हुई। यहां हर दस मिनट में एक बच्चा बीमारी के कारण मारा गया जबकि चार लाख बच्चे कुपोषित हो गए।

 

सोमालिया: 1991 में शुरू हुए गृह युद्ध के पहले नौ महीने में 1800 बच्चों की मौत हो गई। वहीं 1278 बच्चों का अपहरण हुआ। हर दस में से छह बीमार बच्चे को इलाज नहीं मिला।

 

इराक: अमेरिकी सेना की कार्रवाई में यहां 2003 से 2011 के बीच 1200 से अधिक बच्चों की मौत हुई। सैकड़ों बच्चे जो युद्ध के दौरान अस्पताल में रहें उन्हें उपचार नहीं मिल सका

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