जब मामला बाहुबली का हो, तब ही क्यों जागती है कलम

जब मामला बाहुबली का हो, तब ही क्यों जागती है कलम

सुल्तानपुर। जिले में जैसे ही कोई बड़ा विवाद सामने आता है खासकर जब वह क्षत्रिय समाज से जुड़ा होता है तो एक खास लेटर पैड सोशल मीडिया पर तैरने लगता है। हैरानी की बात यह है कि यह लेटर किसी आम व्यक्ति का नहीं बल्कि एक शिक्षक और जनप्रतिनिधि का होता है। सवाल यह है कि क्या एक शिक्षक का धर्म समाज में संतुलन और सद्भाव बढ़ाना नहीं होना चाहिए। हाल ही में वायरल हुए एक पत्र में विधान परिषद सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर एक जमीन विवाद के मामले में पूरे परिवार को अभियुक्त बनाए जाने की साजिश का जिक्र किया। लेकिन इस पत्र के सामने आने के बाद जिले में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया क्या जनप्रतिनिधि का दायित्व न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना है या समाज में निष्पक्षता का संदेश देना?
लोग पूछ रहे हैं कि सुल्तानपुर में पिछले कुछ समय में कई बड़ी घटनाएं हुईं लेकिन उन मामलों में ऐसा कोई पत्र सामने नहीं आया। फिर जैसे ही मामला किसी बाहुबली या प्रभावशाली परिवार से जुड़ता है सक्रियता अचानक क्यों बढ़ जाती है। समाज में यह भी चर्चा है कि इस तरह के पत्र अनजाने में ही सही लेकिन जातीय भावनाओं को हवा देने का काम करते हैं। एक शिक्षक से अपेक्षा होती है कि वह समाज को जोड़ने की भूमिका निभाए न कि किसी खास वर्ग के पक्ष में खड़े दिखें।
हालांकि इस पूरे प्रकरण में एसपी चारु निगम की भूमिका अलग ही दिखाई दी। सूत्र बताते हैं कि मामले में पुलिस ने पूरी निष्पक्षता के साथ जांच की और किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं किया। यही वजह रही कि कथित कोशिशों के बावजूद पुलिस की कार्रवाई पर कोई असर नहीं पड़ा। कहा भी जाता है जीते जी मक्खी नहीं निगली जाती। सुल्तानपुर पुलिस ने भी यही संदेश दिया कि कानून की नजर में सब बराबर हैं चाहे दबाव कितना भी बड़ा क्यों न हो। अब देखना यह होगा कि जनप्रतिनिधि अपनी भूमिका को किस दिशा में ले जाते हैं समाज को जोड़ने की दिशा में या फिर ऐसे पत्रों के जरिए अनावश्यक विवाद खड़े करने की राह पर

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