*टके की कलम और टके के कलमकार।*

 

*विचारणीय क्या हमारी लेखनी स्वतंत्र है?*

एक समय था जब क्षेत्रीय कलमकार से क्षेत्रीय जनता और क्षेत्रीय अधिकारी अपनी बात कहते थे और मदद मांगते थे यही हाल जिले के कलमकारों का था और यही देश के बड़े कलमकारों का ।वक्त बदलता गया धीरे-धीरे कलमकारों की न कलम रही और न ही रचनाएं ।कभी एक कलमकार मुंशी प्रेमचंद हुआ करते थे जो चवन्नी का हाथी जैसी रचनाएं लिख कर समाज को आईना दिखाया करते थे। मगर समय बदल चुका हैअब तो सब डिजिटल है मुंह से बोलो तो मोबाइल स्वयं लिख देता है। जिस कारण कलमकार समाप्त होने की कगार पर है।कभी रचना करने के बाद प्रकाशन की चिन्ता हुआ करती थी परंतु अब लिखा और तुरन्त वाट्स ऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे एकाउंट पर शेयर ,न विज्ञापन की चिंता न प्रकाशन की ।इसी लिए बेरोजगारी के दौर में नाम के कलाकारों की बढ़ती संख्या ने कलमकारों को टके का बना दिया। ऊंची ऊंची शान , सूट-बूट की आन, बड़ी बड़ी गाडियां ऊपर से गाड़ी पर लगा कलमकार का टैक आज बस यही कलमकार की पहचान मानी जाती है।जो जितनी ज्यादा बेईमान, मक्कारों के साथ फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर डाले और जितनी मक्कारी कर बड़ी बड़ी गाड़ियों से टहले वो उतना बड़ा कलमकार ।ऐसी में आम जनमानस भी कलमकार की पहचान भूल चुका है।कभी सब्जी के ठेले पर कलमकार होने की धौंस जमा कर फोकट में सब्जी घर जाती है।तो कभी चाय वाले पर धौंस जमा कर फोकट की चाय सुड़कते है और शान से अपने आप को कलमकार कहते हैं।मगर शायद यह कलमकार की आड़ में हरामखोर हो चुके हैं।बस एक बार कैसे भी कलमकार का बिल्ला लग गया फिर क्या । फिर तो आ जीवन सोशल मीडिया से दो दो लाइन के कलमकार तैयार।एक चाय की टपरी पर जब मैं पहुंचा तो देखा की एक व्यक्ति बीच में बड़ी ठाठ से बैठा सिगरेट के कश और एक हाथ से चाय पीकर लोगों को अपने गुड़गांन की गाथा सुना रहा था ।फ्ला दरोगा जी हमारे मित्र हैं फ्ला सिपाही हमारा चेला है कोई काम हो खाली हमारा फोन ही काफी है।और आस पास बैठ युवक जी दादा ,जी दादा का जाप जप रहें थे मानो चाय की टपरी पर उन्हें साक्षात कलमकारों के गुरू घंटाल मिल गए हो। मैंने चाय वाले से जब पूछा यह कौन है तो उसने फुस्फुसाते हुए बताया सब हरामखोर है।आ जाते हैं बैठ कर फोकट की चाय पिलाओ ,सिगरट ,मसाला खिलाओ पैसे के नाम पर हिसाब में लिख लो और चाय वाला यह कहकर महोदय के घर तक पहुंच गया। मैं सोचने लगा यार जब पैसे नहीं देते तो यह चाय क्यों देता है आखिर मुझसे रहा नहीं गया मैं ने घुमा कर पूछा तुम कैसे जानते हो यह कलमकार हैं तो उसने बताया हमको क्या पता हमने कभी इन की रचना तो पढ़ी नहीं । हां सब कहते हैं ये कलमकार हैं और आए दिन दरोगा जी को भी चाय पिलाने लाते हैं और यही लेन-देन भी हो जाता है। गाड़ी पर भी कलमकार लिखा है।बाकि हमने कभी कोई रचना तो देखी नहीं हां पूर्व में एक दरोगा जी बहुत ईमानदार आए थे ।वो उन्हो ने साफ मना कर दिया कि दलाली लेकर मेरे पास मत आना ।तो यह सब गिरोह के साथ उन के पीछे पड़ गए कि दरोगा जी यहां खाते हैं दरोगा जी यहां सोते हैं और यहां बैठते हैं और जब कुछ नहीं मिला तो दरोगा जी ने एक गरीब को कुछ पैसे घर के खर्च के लिए दिए थे लौटाते समय फोटो खींच कर वाट्स ऐप वाट्स ऐप खेल कर उन्हें भी हटवा दिया।हमने पूछा तो तुम अपना पैसा क्यो नही मांगते तो टपरी वाला बोला साहब गरीब आदमी हूं सड़क किनारे दुकान लगाकर परिवार का पेट पालता हूं इन से कौन भिड़े दुकान हटवा कर बेरोजगार नहीं होना।तब मेरी समझ में आया की आखिर टके की कलम तो होती ही थी मगर अब तो टके के कलमकार भी होने लगे वाहहहहह डिजिटल इन्डिया वाहहहहहहह

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