क्षेत्र सकरन में गुटखा ‘सिंडिकेट’ का नंगा नाच: जनता की जेब पर डाका, प्रशासन खामोश

क्षेत्र सकरन में गुटखा ‘सिंडिकेट’ का नंगा नाच: जनता की जेब पर डाका, प्रशासन खामोश

सकरन (सीतापुर): क्षेत्र सकरन में इन दिनों कानून के हाथ गुटखा माफियाओं की ‘तिजोरियों’ के नीचे दबे नजर आ रहे हैं, क़ानून के हाँथ लम्बे हाँथ सिर्फ कागजो तक ही सीमित नजर आ रहे या सिर्फ गरीबों के गलेबान तक ही पहुँच पाते। सकरन के सांडा, महराजनगर, मोहलिया, कोंसर, ओड़ा झार, गोडियन पुरवा, कम्हरिया खुन खुन, बबौर, गजनीपुर, हरैया में पान मसाला और गुटखा के थोक विक्रेताओं ने मिलकर एक ऐसा खूनी सिंडिकेट तैयार किया है, जो आम जनता की मेहनत की कमाई को सरेआम नोच रहा है। हैरानी की बात यह है कि महज 90 दिनों के भीतर कीमतों में 100% तक का करंट लगा दिया गया है और पूरा प्रशासनिक अमला ‘कुंभकर्णी नींद’ का आनंद ले रहा है।
गोदामों में ‘कैद’ माल, बाजार में बनावटी ‘काल’

बाजार में सामान की कोई किल्लत नहीं है, बल्कि यह ‘मैन-मेड क्राइसिस’ है। सकरन और सांडा के रसूखदार डिस्ट्रीब्यूटर्स ने एक सोची-समझी साजिश के तहत अपने गोदामों को माल से पाट दिया है। कृत्रिम किल्लत पैदा कर बाजार में हाहाकार मचाया जा रहा है, ताकि पीछे छिपे ‘सफेदपोश’ मुनाफाखोर कालाबाजारी के खेल को परवान चढ़ा सकें।

लूट का गणित: रोंगटे खड़े कर देने वाले आंकड़े

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि कैसे चंद महीनों में गुटखा माफियाओं ने कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है:

स्थानीय बड़े दुकानदारों ने पान मसाला गुटखा पर इस कदर लूटमचा रखी है कि जो
राजश्री का एक पैकेट0₹130 – से 140 रुपए में बेच रहे थे वही मसाले का पैकेट काला बाजारी कर 250 रुपए से ऊपर बेचा जा रहा है गुटखा शौकीनों के अनुसार जो दिलबाग मसाले का पैकेट 130 रुपए प्रति पैकेट के हिसाब से बिक्री की जाती थी वहीं अब भ्रष्टाचारी भूखे भेड़ियों के द्वारा 240 रु से भी ऊपर वसूले जा रहे हैं, इसी तरीके से आदर,स्वांग,हरसिंगार जैसे गुटखों के ब्रांड से सारा बाजार पटा पड़ा है।

‘मगरमच्छों’ की मलाई, गुमटी वालों की शामत

इस सिंडिकेट के खेल में सबसे ज्यादा अगर कोई पिस रहा है, तो वो है सड़क किनारे गुमटी लगाने वाला छोटा दुकानदार। बड़े एजेंसी धारक तो एयरकंडीशन कमरों में बैठकर नोटों की गड्डियां गिन रहे हैं, लेकिन ग्राहकों की गालियां और उनका गुस्सा उन गरीब फुटकर विक्रेताओं को झेलना पड़ रहा है जो मजबूरी में महंगा माल खरीद रहे हैं।

जब कोई छोटा दुकानदार रेट बढ़ने का कारण पूछता है, तो डिस्ट्रीब्यूटर्स का रटा-रटाया जुमला होता है- “पीछे से (कंपनी से) रेट बढ़ गए हैं।” > बड़ा सवाल: क्या देश की कोई भी रजिस्टर्ड कंपनी रातों-रात अपनी कीमतें दोगुनी कर सकती है? या फिर यह स्थानीय स्टॉकहोल्डर्स का बनाया हुआ वह ‘आर्थिक अपराध’ है, जिसे सत्ता और अधिकारियों का मूक संरक्षण प्राप्त है?
प्रशासनिक चुप्पीः क्या ‘मलाई’ का हिस्सा ऊपर तक है?

सकरन और सांडा की गलियों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या खाद्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की आंखों पर ‘नोटों की पट्टी’ बंधी है? जनता सीधे तौर पर सवाल उठा रही है कि आखिर इन मुनाफाखोरों के गोदामों पर छापेमारी करने से विभाग के हाथ-पांव क्यों फूल रहे हैं?

जनता की दहाड़ः अब तो जागिए हुजूर !

क्षेत्र के नागरिकों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी

मांगें स्पष्ट हैं:

1. वीडियो ग्राफी के साथ छापेमारीः थोक विक्रेताओं के गोदामों की तत्काल जांच हो।

2. रेट लिस्ट का अनिवार्य प्रदर्शनः हर दुकान पर आधिकारिक मूल्य सूची चस्पा की जाए।

3. जेल की सलाखें: कालाबाजारी करने वाले सिंडिकेट के ‘आकाओं’ को चिह्नित कर जेल भेजा जाए।

अब देखना यह है कि क्या सीतापुर प्रशासन इन ‘गुटखा माफियाओं’ पर चाबुक चला पाता है या फिर जनता इसी तरह इस ‘सिंडिकेट राज’ में लुटती रहेगी।

 

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