
डीएम की सख्ती से खुला गेहूं खरीद का मामला, 90 बोरी के कागज पर 135 बोरी मिलीं बी-पैक्स प्रभारी पर मुकदमा
नैमिष टुडे/ ब्यूरो, अम्बेडकरनगर
अम्बेडकरनगर में गेहूं खरीद में गड़बड़ी की शिकायत को प्रशासन ने गंभीरता से लिया तो बी-पैक्स जीवत क्रय केंद्र की व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई। जांच में 90 बोरी की निर्धारित सीमा के मुकाबले 135 बोरी गेहूं मिलने, किसान की मौके पर गैरमौजूदगी और दस्तावेजों में विरोधाभास सामने आने के बाद केंद्र प्रभारी/प्रभारी सचिव धर्मेन्द्र कुमार के खिलाफ धारा 318(4) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
इस कार्रवाई ने एक बात साफ कर दी है कि सरकारी खरीद व्यवस्था में शिकायत मिलने के बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच को आगे बढ़ाया जा सकता है और गड़बड़ी सामने आने पर जिम्मेदारी भी तय हो सकती है। मामले में जिलाधिकारी के स्तर से शिकायत और जांच को गंभीरता से लिए जाने के बाद कार्रवाई आगे बढ़ी, जबकि अब सवाल सहकारिता विभाग की निगरानी व्यवस्था पर खड़े हो रहे हैं।
शिकायत आई तो रात में ही जांच के लिए पहुंची टीम
30 अप्रैल की रात करीब नौ बजे गेहूं से संबंधित शिकायत सामने आई। रात करीब 11 बजे जिला खाद्य विपणन अधिकारी को साक्ष्य उपलब्ध कराए गए। इसके बाद सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिता तथा विपणन निरीक्षक कटेहरी रात करीब 12 बजे मौके पर पहुंचे।
यानी शिकायत को अगले दिन तक टालने के बजाय रात में ही मौके पर जाकर स्थिति का सत्यापन किया गया। जांच में ट्रॉली पर गेहूं लदा मिला, लेकिन गेहूं पर दावा करने वाला कोई व्यक्ति मौके पर नहीं था।
90 बोरी की सीमा के सामने 135 बोरी ने खड़े किए सवाल
केंद्र प्रभारी ने मौके पर मिले गेहूं को किसान देवमणि द्विवेदी का बताया और उनका पंजीकरण व खतौनी प्रस्तुत की।
जांच में पाया गया कि किसान के पंजीकरण में गेहूं बिक्री की अधिकतम सीमा 45 कुंतल यानी 90 बोरी थी, जबकि मौके पर 135 बोरी गेहूं मिला।
यानी कागज पर जितनी अधिकतम मात्रा थी, उससे 45 बोरी अधिक गेहूं मौके पर कैसे पहुंचा—यही सवाल पूरे मामले की जांच का अहम आधार बना।
देवमणि द्विवेदी भी जांच के समय मौके पर मौजूद नहीं मिले।
बाद में सामने आया दूसरे किसान का पंजीकरण
केंद्र प्रभारी ने अपने स्पष्टीकरण के साथ किसान सूर्यमणि द्विवेदी का पंजीकरण भी प्रस्तुत किया। हालांकि जांच रिपोर्ट के अनुसार 30 अप्रैल की रात के सत्यापन और दो मई को जिला खाद्य विपणन अधिकारी की जांच के दौरान सूर्यमणि द्विवेदी का उल्लेख सामने नहीं आया था।
दस्तावेजों और मौके की स्थिति में इस अंतर को भी जांच में महत्वपूर्ण माना गया।
नियमों की जानकारी नहीं होने का तर्क भी नहीं आया काम
जांच में केंद्र प्रभारी द्वारा किसान के घर से गेहूं की तौल कराने की बात स्वीकार किए जाने का उल्लेख है। नियमों की जानकारी नहीं होने की बात कही गई।
लेकिन गेहूं खरीद शुरू होने से पहले केंद्र प्रभारियों को क्रय नीति, भंडारण, बिलिंग और भुगतान संबंधी नियमों का प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी जांच में सामने आई।
ऐसे में प्रशासनिक जांच में नियमों की अनदेखी का बिंदु भी महत्वपूर्ण हो गया।
डीएम के स्तर से कार्रवाई ने बढ़ाई जवाबदेही
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि शिकायत सामने आने के बाद मामला केवल कागजी जांच तक सीमित नहीं रहा। रात में मौके पर सत्यापन हुआ, बाद में जिला खाद्य विपणन अधिकारी स्तर से भी जांच हुई और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ी।
यही प्रशासनिक सख्ती अब खरीद केंद्रों की निगरानी व्यवस्था के लिए भी संदेश मानी जा रही है।
सरकारी खरीद में किसान के नाम, पंजीकरण, तौल और वास्तविक गेहूं की मात्रा में अंतर मिलने पर केवल स्पष्टीकरण के भरोसे मामला खत्म नहीं किया जा सकता बी-पैक्स जीवत प्रकरण में हुई कार्रवाई इसका उदाहरण बन गई है।
सवाल अब सहकारिता विभाग की निगरानी पर
मामले में केंद्र प्रभारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल सहकारिता विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी खड़ा हो गया है।
जब केंद्र पर खरीद नियमों के तहत काम होना था, तो क्या नियमित निरीक्षण में किसान के पंजीकरण, वास्तविक मात्रा और तौल प्रक्रिया का सत्यापन किया जा रहा था?
यदि 90 बोरी की सीमा वाले किसान के नाम पर मौके पर 135 बोरी गेहूं मिला, तो यह अंतर पहले क्यों नहीं पकड़ा गया?
डीएम की कार्रवाई से सामने आया अंतर
बी-पैक्स जीवत प्रकरण में प्रशासन की कार्रवाई और विभागीय निगरानी के बीच अंतर अब चर्चा का विषय बन गया है। शिकायत के बाद मौके पर जांच कराई गई और तथ्यों के आधार पर मुकदमा दर्ज हुआ।
इससे यह संदेश गया है कि खरीद व्यवस्था में अनियमितता की शिकायत को दबाने के बजाय उसका मौके पर सत्यापन और दस्तावेजों के आधार पर परीक्षण किया जा सकता है।
अब जरूरत इस बात की है कि पूरे प्रकरण में यह भी स्पष्ट किया जाए कि क्रय केंद्र की नियमित निगरानी किस स्तर पर हो रही थी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए सहकारिता विभाग क्या कदम उठाता है।
बी-पैक्स जीवत की 135 बोरी गेहूं की कहानी अब सिर्फ एक केंद्र प्रभारी पर हुई कार्रवाई नहीं, बल्कि सरकारी खरीद व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गई है।